Shalini Saraswathi Marathon run without arms and legs Paralympic is the dream of Bengaluru Blade Runner


नई दिल्ली. बेंगलुरु भारत का आईटी हब… यह शहर लाखों युवाओं के सपने पूरे करता है और उन्हें नए सपने भी दिखाता है. यही शहर कुछ ऐसे सपने भी लोगों को देता है, जिन्हें सुनकर आप दांतों तले अंगुली दबा लेंगे. बेंगलुरु की शालिनी सरस्वती ने भी इसी शहर में रहते हुए एक सपना देखा. कुछ कर दिखाने का सपना…. आगे बढ़ने का सपना… आम लड़के-लड़कियों के लिए इस तरह का सपना देखना कोई अनोखी बात नहीं है. बहुत-से लड़के-लड़कियां शालिनी जैसे ही सपने देखते भी हैं और पूरे भी करते हैं, लेकिन शालिनी इस पूरी भीड़ से एकदम अलग हैं. शालिनी के दोनों हाथ और पैर नहीं हैं. बावजूद, शालिनी ने दौड़ने का ना केवल सपना देखा और उसे पूरा भी किया.

शालिनी सरस्वती का जीवन कभी भी आसान नहीं रहा. शालिनी की शादी प्रशांत के साथ हुई थी. 2013 में कंबोडिया में अपनी शादी की सालगिरह मनाने के बाद शालिनी और उनके पति खुशी-खुशी भारत लौट रहे थे. गर्भवती होने के कारण वह बहुत खुश भी थी. जाहिर है यह खुशी का मौका था, लेकिन नियति ने उनके लिए दुख का एक अलग ही सैलाब तैयार कर रखा था. कंबोडिया में रहने के दौरान उन्हें हल्का बुखार था, लेकिन घर लौटने के बाद उनका बुखार तेज हो गया. डॉक्टर के पास गए तो उन्हें लगा कि शायद डेंगू है. जांच कराई गई. जांच में उन्हें एक गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन की जानकारी मिली. धीरे-धीरे शालिनी के हाथ-पांव भी सड़ने लगे थे. यह इंफेक्शन 10 लाख में से एक व्यक्ति को होता है.

शालिनी सरस्वती कई दिन आईसीयू में रहीं. उनके बचने की केवल पांच फीसदी उम्मीद थी. इलाज के दौरान शालिनी ने अपने बच्चे को खो दिया और शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से बहुत आहत हुईं. शालिनी बच तो गईं, उस समय उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था. हालांकि, उनकी जीजिविषा ने उन्हें मौत से बचा लिया. लेकिन उन्हें अपने दोनों हाथ और दोनों पैर गंवाने पड़े.

विडंबना देखिए कि शालिनी को अपने पैरों में नेल पॉलिश लगाने का बड़ा शौक था, लेकिन क्रूर नियति ने उनके पैर भी उनसे छीन लिए, लेकिन उन्हें उम्मीद और हौंसला नहीं खोया. 2014 में वह एक बार फिर कृत्रिम पैरों का उपयोग करके अपने पैरों पर वापस आ गईं. उन्होंने अपने ‘नए’ पैरों का उपयोग करने का अभ्यास किया और दिसंबर 2014 में फिर से चलना शुरू कर दिया. शालिनी अपने जैसे विकलांग व्यक्ति के प्रति समाज के रवैये से अवगत थी. उनके आसपास के लोगों ने उसकी सहानुभूति दिखाई, जिससे वह नफरत करती थीं.

वह खुद को साबित करना चाहती थी. वह रनिंग ब्लेड पर दौड़ने का अभ्यास करती रहीं. उन्होंने कोच बीपी अयप्पा के तहत अपना प्रशिक्षण शुरू किया. वह प्रतिदिन 90 मिनट चलने का अभ्यास करती थीं. प्रशिक्षण सत्र उसके लिए वास्तव में कठिन हुआ करता था, लेकिन शालिनी ने यह सब झेलने की ठान ली थी. दो साल के कठोर प्रशिक्षण के बाद शालिनी आखिरकार बैंगलोर में टीसीएस वर्ल्ड 10 किलोमीटर दौड़ में हाफ मैराथन दौड़ने में सफल रहीं.

शालिनी सरस्वती का कहना है कि मेरे कोच बीपी अयप्पा मुझे कभी दिव्यांग नहीं समझते और हमेशा प्रेरित करते हैं. बेंगलुरु मैराथन के लिए शालिनी ने एक जर्मनी कंपनी से 10 लाख रुपए के लोन पर रनिंग ब्लेड खरीदे. शालिनी का लक्ष्य पैरालंपिक में भाग लेना है. शालिनी कभी एक अच्छी भरतनाट्यम डांसर भी रही हैं.

शालिनी जब तक संभव हो दौड़ना जारी रखना चाहती है, क्योंकि इससे उसे स्वतंत्रता का अहसास होता है और वह इसके माध्यम से अपने जैसे कई अन्य लोगों को प्रेरित कर सकती हैं. वह आपके शरीर में सुंदरता और आत्मविश्वास महसूस करने में भी विश्वास करती है. वह आप जैसे हैं, वैसे ही रहने और उन सभी लड़कियों को खुद से प्यार करने का संदेश देती हैं, जो कम वजन या अधिक वजन जैसी कुछ छोटी-छोटी समस्याओं के कारण सुंदर दिखने और आत्मविश्वास की कमी से ग्रस्त हैं.

Tags: Bangalore, Marathon, Paralympic, Shalini Saraswathi





Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published.

forty  ⁄    =  ten